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तेरे इश्क़ का रस चखकर ज़हरीली होगयी है जिंदिगी आजकल। 


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कश्मकश है ये भी की झूठ कितना बोला जाए। कितना सच है इश्क़ में ये कैसे तोला जाए। 


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मेहबूब न मिले तो डरता कौन है, आजकल इश्क़ जी-जान से करता कौन है। 


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जो भूल गया है उसे भुला देते है। चलो इन तस्वीरों  को चुम कर जला देते है। 


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तुम लोग तो बस अल्फाजो को पढ़ लेते हो, कभी सोचा कितना दर्द बड़ा होगा तब ये अलफ़ाज़ कलम तक आये होंगे


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मेरा किरदार बिना इश्क़ के जचेगा क्या। अगर खुद से तुम्हे निकाल दू तो बचेगा क्या। 


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वो भी जिन्दा है,मैं भी जिन्दा हूँ… क़त्ल सिर्फ इश्क़ का हुआ है


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आवाज़ नहीं होती दिल टूटने की. लेकिन तकलीफ बहुत होती हैं.


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वो जो कल रात चैन से सोया हैं , उसको खबर भी नहीं कोई उसके लिए कितने रोया हैं..


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मत करो उसके मैसेज का इन्तजार जो ऑनलाइन तो है पर किसी और के लिया..